पुतिन ने राजघाट विजिटर्स बुक में रूसी भाषा में लिखा ‘गुप्त संदेश’: क्या है इसका ‘बराबरी वाले विश्व’ से कनेक्शन?

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का हालिया दो दिवसीय भारत दौरा वैश्विक भू-राजनीति और द्वि-पक्षीय संबंधों के लिहाज से लगातार अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में बना हुआ है। उनकी यात्रा के दूसरे दिन, शुक्रवार की सुबह, उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि स्थल राजघाट पर शांतिपूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की। यह कूटनीतिक कदम जितना सामान्य दिखा, उतना था नहीं। फूल चढ़ाने और मौन सम्मान प्रकट करने के बाद, उन्होंने विजिटर्स बुक में रूसी भाषा में एक विशेष और गहरा संदेश लिखा, जो न केवल गांधीजी के प्रति रूस के सर्वोच्च सम्मान को दर्शाता है, बल्कि आधुनिक विश्व व्यवस्था, वैश्विक संतुलन और भारत-रूस संबंधों पर पुतिन की सुविचारित दृष्टि को भी उजागर करता है।

यह संदेश, जिसकी मूल भाषा रूसी है, कूटनीतिक गलियारों में एक नया विमर्श पैदा कर रहा है। इसके प्रत्येक शब्द में वैश्विक प्रभुत्व के बजाय पारस्परिक सम्मान और न्याय पर आधारित एक बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना का संकेत छिपा है। यह लेख पुतिन के इस संदेश का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, साथ ही यह भी बताता है कि उन्होंने इसमें रूसी दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय का उल्लेख क्यों किया और इसका भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के लिए क्या महत्व है।


🧐 पुतिन के संदेश का भावार्थ: ‘मानवता के महान मार्गदर्शक’

राजघाट पर शांत वातावरण में कुछ क्षण बिताने और बापू को श्रद्धांजलि देने के बाद, राष्ट्रपति पुतिन ने विजिटर्स बुक में अपने हाथों से रूसी में एक नोट अंकित किया। इस नोट का हिंदी में भावार्थ अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने महात्मा गांधी को सिर्फ भारत का नेता नहीं, बल्कि “मानवता के महान मार्गदर्शक” के रूप में वर्णित किया।

📝 राजघाट नोट के मुख्य अंश (हिंदी अनुवाद)

पुतिन ने अपने संदेश में गांधीजी की भूमिका और उनके दर्शन पर गहन प्रकाश डाला:

  • मानवतावादी और दूरदर्शी: “महात्मा गांधी आधुनिक भारत के निर्माण में एक अहम भूमिका निभाने वाले एक महान मानवतावादी और दूरदर्शी व्यक्तित्व थे।”
  • अमूल्य वैश्विक योगदान: “वैश्विक शांति के लिए उनका योगदान अमूल्य है।”
  • शाश्वत प्रासंगिकता: “उनके विचार—स्वतंत्रता, सत्य, अहिंसा और मानवता—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे।”
  • ‘नए और बराबरी वाले विश्व’ की नींव: संदेश में आगे पुतिन ने गांधीजी के उस दर्शन की चर्चा की जिसे वे “नए और बराबरी वाले विश्व” की नींव मानते थे। यह वाक्यांश आज की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के संदर्भ में अत्यधिक सांकेतिक है।

यह नोट स्पष्ट करता है कि पुतिन की नज़र में, गांधीजी का प्रभाव केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी विश्व व्यवस्था का वैचारिक आधार है जिसका समर्थन रूस आज वैश्विक मंचों पर कर रहा है।


🏛️ टॉल्स्टॉय और गांधी: ‘समानता’ के दर्शन का संगम

पुतिन के संदेश का सबसे अनूठा और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा रूसी दार्शनिक और लेखक लियो टॉल्स्टॉय का विशेष उल्लेख है। उन्होंने गांधी और टॉल्स्टॉय के विचारों के बीच एक गहरा वैचारिक सेतु स्थापित किया।

✍️ टॉल्स्टॉय-गांधी पत्राचार और पुतिन का संकेत

पुतिन ने लिखा: “गांधीजी एक ऐसे वैश्विक ढांचे का सपना देखते थे जहां प्रभुत्व के बजाय समानता और सम्मान हो। उन्होंने अपने समय में रूसी दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय के साथ पत्राचार में इसी विचार को साझा किया था—एक ऐसी दुनिया, जो परस्पर सम्मान, नैतिक मूल्यों और बराबरी के सिद्धांतों पर खड़ी हो।”

यह संदर्भ अत्यंत मार्मिक और सामरिक है। लियो टॉल्स्टॉय और महात्मा गांधी के बीच हुए ऐतिहासिक पत्राचार ने गांधीजी के सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन की वैचारिक नींव को मजबूती दी थी। पुतिन ने इस ऐतिहासिक तथ्य को उठाकर एक स्पष्ट संदेश दिया है:

  1. साझा वैचारिक आधार: रूस और भारत के बीच केवल सामरिक हित नहीं, बल्कि मूल्यों की एक साझा दार्शनिक विरासत है, जो दोनों देशों को पश्चिमी प्रभुत्व की सोच से अलग करती है।
  2. नैतिक राजनीति की वकालत: दोनों विचारक एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते थे जो सैन्य या आर्थिक शक्ति के बजाय नैतिक मूल्यों और न्याय के सिद्धांतों पर संचालित हो।
  3. बहुध्रुवीयता का समर्थन: पुतिन इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि टॉल्स्टॉय और गांधी का यह सपना—जहां दुनिया किसी एक शक्ति के दबदबे से नहीं—बल्कि पारस्परिक सम्मान से संचालित हो, आज के रूस और भारत की विदेश नीति का मूल आधार है।

🌍 बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का पुतिन मॉडल

टॉल्स्टॉय का उल्लेख करके पुतिन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को एक वैचारिक लेंस से देखते हैं। वह एक ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं:

  • संप्रभुता का सम्मान: सभी राज्यों की संप्रभुता का पूर्ण सम्मान हो।
  • दबाव-मुक्त सहयोग: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग किसी भी देश के दबाव (coercion) से मुक्त हो।
  • समानता पर आधार: साझेदारी और सहयोग आपसी बराबरी (equality) के सिद्धांतों पर स्थापित हो।

🚀 भारत-रूस संबंधों की नींव: साझा मूल्यों पर आधारित साझेदारी

पुतिन के संदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने गांधी और टॉल्स्टॉय के मूल्यों को आज की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और भारत-रूस संबंधों से जोड़ा।

💡 कूटनीतिक निहितार्थ

संदेश के अंतिम भाग में पुतिन ने लिखा: “आज भारत और रूस वैश्विक मंच पर उन्हीं सिद्धांतों का समर्थन करते हैं, ऐसा ढांचा जहां किसी पर दबाव न हो, राज्यों की संप्रभुता का सम्मान हो और सहयोग आपसी बराबरी के आधार पर हो। हमारा संबंध इन्हीं साझा मूल्यों पर खड़ा है।”

यह एक स्पष्ट कूटनीतिक संकेत है जिसके कई गहरे निहितार्थ हैं:

  • पश्चिमी दबाव से स्वतंत्रता: यह संदेश वैश्विक समुदाय, विशेष रूप से पश्चिमी देशों, को यह बताता है कि रूस अपनी भारत रणनीति को किसी भी बाहरी दबाव से स्वतंत्र रखता है। भारत के साथ उसकी साझेदारी सैद्धांतिक और मूल्य-आधारित है, न कि केवल सामरिक या अवसरवादी।
  • रणनीतिक स्वायत्तता: रूस, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सराहना करता है, क्योंकि भारत भी किसी एक धुरी या गुट के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करता। दोनों देश मिलकर एक ऐसी विश्व व्यवस्था की ओर देख रहे हैं जहाँ प्रत्येक राष्ट्र को अपने हितों और मूल्यों के अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार हो।
  • सांस्कृतिक कूटनीति: गांधी-टॉल्स्टॉय के तार जोड़कर पुतिन ने सांस्कृतिक कूटनीति का उपयोग किया है, जो भारत और रूस के बीच “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” को एक दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।

📚 लियो टॉल्स्टॉय: एक दार्शनिक जिसने गांधी को प्रेरित किया

चूँकि पुतिन ने अपने संदेश में लियो टॉल्स्टॉय का ज़िक्र किया है, इसलिए यह जानना आवश्यक है कि उनका वैचारिक योगदान क्या था और उन्होंने गांधीजी को किस प्रकार प्रभावित किया।

🌟 टॉल्स्टॉय का परिचय और दर्शन

  • महान साहित्यकार: लियो टॉल्स्टॉय (1828–1910) रूस के महानतम साहित्यकारों में से एक थे। उनकी कृतियाँ, जैसे ‘वॉर एंड पीस’ (War and Peace) और ‘अन्ना कैरेनिना’ (Anna Karenina), विश्व साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में गिनी जाती हैं।
  • दार्शनिक और समाज सुधारक: साहित्यिक प्रसिद्धि से परे, टॉल्स्टॉय जीवनभर अहिंसा, समानता, आत्मानुशासन और सरलता के पक्षधर रहे। उनका दर्शन ईसाई अराजकतावाद (Christian Anarchism) पर आधारित था, जो राज्य और चर्च दोनों के प्रभुत्व को अस्वीकार करता था।
  • गांधीजी पर प्रभाव: टॉल्स्टॉय के ‘द किंगडम ऑफ गॉड इज विदइन यू’ (The Kingdom of God Is Within You) और अहिंसा पर उनके अन्य लेखन ने युवा मोहनदास करमचंद गांधी को गहराई से प्रभावित किया।
    • गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अपना पहला आश्रम “टॉल्स्टॉय फार्म” नाम दिया था।
    • गांधीजी ने स्वयं स्वीकार किया था कि टॉल्स्टॉय के विचारों ने उनके सत्याग्रह और अहिंसक प्रतिरोध आंदोलन की वैचारिक और दार्शनिक नींव को मजबूत किया।
  • पत्राचार: दोनों महापुरुषों के बीच 1909 और 1910 के बीच महत्वपूर्ण पत्रों का आदान-प्रदान हुआ, जो अहिंसा के दर्शन को एक वैश्विक आंदोलन का रूप देने में सहायक सिद्ध हुआ।

पुतिन ने इस वैचारिक बंधन का उल्लेख करके यह दर्शाया है कि भारत-रूस संबंध केवल वर्तमान हितों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि लगभग एक सदी पुराने साझा दार्शनिक मूल्यों पर टिके हैं।

📜 महात्मा गांधी का आधुनिक भारत में महत्व

गांधीजी का योगदान केवल स्वतंत्रता दिलाने तक सीमित नहीं था; उन्होंने एक नैतिक और समावेशी समाज की नींव रखी।

  1. सामाजिक समरसता: उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सामाजिक समानता की वकालत की।
  2. आर्थिक स्वावलंबन: खादी और ग्रामोद्योग के माध्यम से उन्होंने आर्थिक स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता) का सिद्धांत दिया, जो आज भी भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ पहलों में प्रतिबिंबित होता है।
  3. राजनीतिक दर्शन: उनका विकेन्द्रीकृत शासन और ग्राम स्वराज का सिद्धांत आधुनिक लोकतंत्रों के लिए आज भी प्रासंगिक है।

🌐 वर्तमान भू-राजनीति में ‘बहुध्रुवीयता’ की बहस

पुतिन का संदेश ‘बराबरी वाले विश्व’ की बात करता है, जो सीधे तौर पर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) की अवधारणा से जुड़ा है।

  • एकल-ध्रुवीयता का अंत: शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका के प्रभुत्व वाली एकल-ध्रुवीय व्यवस्था को अब रूस, चीन और भारत जैसे उभरते देश चुनौती दे रहे हैं।
  • समानता का सिद्धांत: बहुध्रुवीयता का अर्थ है कि शक्ति का केंद्र किसी एक देश के पास नहीं रहेगा, बल्कि यह कई शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच बंटेगा, जिससे किसी एक के दबदबे की संभावना कम होगी।
  • BRICS और SCO की भूमिका: भारत और रूस दोनों BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर सक्रिय हैं, जो एक बहुध्रुवीय और समावेशी वैश्विक वास्तुकला की वकालत करते हैं।

इस प्रकार, राजघाट से पुतिन का संदेश केवल महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि नहीं था, बल्कि वैश्विक शासन के मौलिक सिद्धांतों पर एक सुविचारित कूटनीतिक वक्तव्य था, जिसने भारत के साथ रूस के रणनीतिक गठजोड़ की दार्शनिक और नैतिक नींव को रेखांकित किया। यह संदेश वैश्विक राजनीति में ‘न्याय और समानता’ की मांग करने वाले सभी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण उद्घोषणा है।


निष्कर्ष

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा राजघाट की विजिटर्स बुक में रूसी भाषा में लिखा गया विशेष नोट एक गहन कूटनीतिक और वैचारिक वक्तव्य है। यह न केवल महात्मा गांधी को एक मानवतावादी और दूरदर्शी के रूप में सम्मान देता है, बल्कि लियो टॉल्स्टॉय के साथ उनके साझा दर्शन को उठाकर बहुध्रुवीय और समानता-आधारित विश्व व्यवस्था के लिए भारत-रूस की संयुक्त वकालत को भी रेखांकित करता है। पुतिन ने स्पष्ट किया है कि भारत-रूस संबंध केवल सामरिक हितों पर नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, संप्रभुता और परस्पर सम्मान के साझा मूल्यों पर टिके हैं। यह संदेश वैश्विक मंच पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति रूस के सम्मान को दर्शाता है और एक ऐसे विश्व के निर्माण के आह्वान को मजबूत करता है, जहाँ राष्ट्रों के बीच सहयोग दबाव-मुक्त और बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित हो।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न.

Q1. पुतिन ने राजघाट विजिटर्स बुक में मुख्य रूप से किस बारे में लिखा?

A: पुतिन ने महात्मा गांधी को “मानवता के महान मार्गदर्शक” और “दूरदर्शी व्यक्तित्व” बताया, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने गांधीजी के विचारों (सत्य, अहिंसा, स्वतंत्रता) को आज भी प्रासंगिक बताया और उन्हें ‘नए और बराबरी वाले विश्व’ की नींव रखने वाला दार्शनिक कहा।

Q2. पुतिन ने अपने संदेश में रूसी दार्शनिक लियो टॉल्स्टॉय का उल्लेख क्यों किया?

A: पुतिन ने टॉल्स्टॉय का उल्लेख इसलिए किया क्योंकि गांधीजी और टॉल्स्टॉय दोनों ने अपने पत्राचार में प्रभुत्व के बजाय समानता और सम्मान पर आधारित एक विश्व का सपना साझा किया था। पुतिन ने इस वैचारिक बंधन का उपयोग यह दर्शाने के लिए किया कि भारत और रूस आज भी उन्हीं साझा मूल्यों (बहुध्रुवीयता, संप्रभुता का सम्मान) पर वैश्विक मंच पर खड़े हैं।

Q3. पुतिन के इस संदेश का भारत-रूस संबंधों के लिए क्या महत्व है?

A: यह संदेश दर्शाता है कि भारत-रूस संबंध केवल रक्षा या आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साझा दार्शनिक मूल्यों पर आधारित हैं। यह वैश्विक समुदाय को एक स्पष्ट संकेत देता है कि दोनों देश किसी बाहरी दबाव के बिना समानता और संप्रभुता के सिद्धांतों के आधार पर अपनी साझेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं।

Q4. पुतिन के ‘बराबरी वाले विश्व’ वाक्यांश का भू-राजनीतिक अर्थ क्या है?

A: ‘बराबरी वाला विश्व’ वाक्यांश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) का समर्थन करता है। इसका अर्थ है कि वैश्विक शक्ति किसी एक देश या गुट के हाथ में केंद्रित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे कई प्रमुख राष्ट्रों के बीच वितरित किया जाना चाहिए, जिससे अंतर्राष्ट्रीय संबंध आपसी सम्मान और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हों।

External Source: bharat24live.com

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