कानपुर कोर्ट परिसर में हाई-वोल्टेज ड्रामा: दरोगा को जड़ा थप्पड़, आरोपी वकील को छुड़ाने के प्रयास में पुलिस से भिड़े अधिवक्ता

उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित कचहरी परिसर में बुधवार को उस समय अभूतपूर्व तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब पुलिस जानलेवा हमले के एक आरोपी, जो पेशे से बहिष्कृत अधिवक्ता भी है, को गिरफ्तार करने पहुंची। गिरफ्तारी के विरोध में वकीलों की एक बड़ी भीड़ पुलिस से भिड़ गई, जिसके परिणामस्वरूप परिसर में अराजकता फैल गई।


⚖️ घटनाक्रम का आरम्भ: एक जघन्य हमले का मामला

यह पूरा विवाद एलएलबी छात्र अभिजीत सिंह पर हुए एक बर्बर जानलेवा हमले से जुड़ा है, जो बीते 25 अक्टूबर को रावतपुर के केशवपुरम इलाके में हुआ था।

🔪 छात्र अभिजीत सिंह पर प्राणघातक हमला

जानकारी के अनुसार, 22 वर्षीय एलएलबी छात्र अभिजीत सिंह पर हमलावरों ने उस समय चापड़ (धारदार हथियार) से हमला किया, जब वह परिसर में मौजूद था। यह हमला इतना भीषण था कि अभिजीत सिंह को कई गंभीर चोटें आईं:

  • दो अंगुलियां कटीं: हमले में पीड़ित की दो अंगुलियां पूरी तरह कट गईं।
  • सिर पर गहरे घाव: सिर पर कई गंभीर घाव आए, जो हमले की क्रूरता दर्शाते हैं।
  • आंतें बाहर निकलीं: पेट पर किए गए वार से उसकी आंतें तक बाहर आ गईं।

फिलहाल, अभिजीत का इलाज सर्वोदय नगर के एक निजी अस्पताल के सघन चिकित्सा इकाई (ICU) में चल रहा है, जहां उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक बताई जा रही है।


🛑 आरोपी की पहचान और गिरफ्तारी का प्रयास

इस जघन्य मामले के मुख्य आरोपी के तौर पर प्रिंस राज श्रीवास्तव की पहचान की गई है, जो कथित तौर पर कानपुर कचहरी से बहिष्कृत अधिवक्ता है। बुधवार को, रावतपुर थाना पुलिस आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव को गिरफ्तार करने के लिए सीधे कचहरी परिसर पहुंची।

🚓 पुलिस बनाम अधिवक्ता: कोर्ट परिसर बना अखाड़ा

जैसे ही पुलिस टीम ने आरोपी प्रिंस राज को गिरफ्तार कर पुलिस वैन में बैठाया, परिसर में मौजूद वकीलों का एक समूह एकजुट होकर पुलिस के विरुद्ध आक्रामक हो गया। देखते ही देखते, वकीलों की भीड़ ने पुलिस वैन को चारों ओर से घेर लिया और आरोपी को बलपूर्वक छुड़ाने का प्रयास करने लगी।

परिणामस्वरूप, स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और यह गिरफ्तारी का साधारण प्रयास एक तीखी झड़प में तब्दील हो गया, जिसने कानून के शासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • तीखी बहस और नारेबाजी: वकीलों और पुलिसकर्मियों के बीच पहले तीखी बहस हुई, जिसके बाद पुलिस विरोधी नारेबाजी शुरू हो गई।
  • दरोगा पर हमला: इस झड़प के दौरान, एक अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी—वकीलों के समूह में से एक व्यक्ति ने ड्यूटी पर तैनात एक दरोगा को थप्पड़ जड़ दिया।
  • धक्का-मुक्की और अभद्रता: पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज भी की गई।
  • पुलिस को जान बचाकर भागना पड़ा: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, कुछ पुलिसकर्मियों को मौके से अपनी जान बचाकर पीछे हटना पड़ा।

अत्यधिक मशक्कत और तनावपूर्ण माहौल के बीच, अतिरिक्त बल के सहयोग से पुलिस आखिरकार आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव को सुरक्षित थाने ले जाने में सफल रही।


🏛️ कानूनी कार्यवाही और पुलिस की चुप्पी

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पुलिस प्रशासन की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। अधिकारियों की इस चुप्पी ने मामले को और भी रहस्यमय बना दिया है।

🧑‍⚖️ अदालत का रुख: न्यायिक हिरासत में आरोपी

कानूनी प्रक्रिया के तहत, गुरुवार को आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अदालत में पेश किया गया।

  • न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को दो दिन की पुलिस हिरासत (Police Custody Remand – PCR) में भेज दिया है।
  • यह हिरासत पुलिस को मामले में और अधिक सबूत जुटाने और हमले के पीछे के वास्तविक मकसद को जानने में मदद करेगी।

🌐 सोशल मीडिया पर जन आक्रोश और कानून व्यवस्था पर सवाल

कानपुर कचहरी परिसर के अंदर हुई इस घटना का वीडियो तत्काल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हो गया। इस वीडियो ने लोगों के बीच गहरा रोष और आक्रोश पैदा किया है।

🗣️ जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर आम लोगों की राय मुख्यतः दो बिंदुओं पर केंद्रित है:

  1. कानून व्यवस्था की विफलता: कई यूज़र्स इसे उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की नाकामी के रूप में देख रहे हैं, जहां कानून के रक्षकों पर ही हमला किया जा रहा है।
  2. वकीलों के आचरण की आलोचना: बड़ी संख्या में लोग वकीलों के इस अशोभनीय और हिंसक आचरण की कड़ी निंदा कर रहे हैं, जो न्यायपालिका की गरिमा के विपरीत है।

“कानपुर कचहरी की यह घटना ‘कानून के रखवालों’ (पुलिस) और ‘कानून के जानकारों’ (अधिवक्ताओं) के बीच टकराव का एक बड़ा और चिंताजनक उदाहरण बन गई है। अब सबकी निगाहें पुलिस प्रशासन और बार एसोसिएशन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं,” एक सामाजिक टिप्पणीकार ने कहा।

🚨 बार एसोसिएशन पर दबाव: पेशेवर आचरण का सवाल

यह घटना वकीलों के पेशेवर आचरण पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। बार एसोसिएशन पर अब यह नैतिक दबाव है कि वह इस हिंसक घटना में शामिल अपने सदस्यों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करे, खासकर तब, जब आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव पहले से ही बहिष्कृत है।

यदि वकीलों का एक समूह खुद कानून को अपने हाथ में लेता है और पुलिस कार्रवाई में बाधा डालता है, तो इससे आम जनता का न्याय प्रणाली में विश्वास कमज़ोर होता है।


🔍 विस्तार से विश्लेषण: क्यों बढ़ते हैं कोर्ट परिसर में ऐसे टकराव?

कोर्ट परिसरों में पुलिस और वकीलों के बीच इस तरह के टकराव की घटनाएँ भारतीय न्यायिक इतिहास में कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन कानपुर की घटना ने हिंसा के स्तर को एक नई ऊँचाई पर पहुंचा दिया है। इसके पीछे कई संरचनात्मक और सामाजिक कारण हैं।

1. ‘अधिवक्ता पहचान’ का दुरुपयोग

कुछ अधिवक्ता, विशेष रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, अपनी ‘अधिवक्ता पहचान’ का दुरुपयोग करके गिरफ्तारी से बचने या अपने साथियों को बचाने का प्रयास करते हैं।

  • गिरफ्तारी से सुरक्षा का भाव: उन्हें अक्सर यह भ्रम होता है कि कोर्ट परिसर के अंदर उनकी गिरफ्तारी नहीं हो सकती, या अगर होती भी है तो उन्हें सामूहिक विरोध के ज़रिए छुड़ा लिया जाएगा।
  • सामूहिक शक्ति का प्रदर्शन: यह विरोध अक्सर कानून के पालन से अधिक सामूहिक शक्ति और पुलिस पर दबाव बनाने का प्रदर्शन होता है।

2. पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह

कई बार, वकीलों को यह आशंका होती है कि पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण या अवैध है, जिसके चलते वे तत्काल विरोध करने पर उतर आते हैं।

3. न्यायिक परिसरों की सुरक्षा में खामियाँ

भारत के अधिकांश कोर्ट परिसर, विशेषकर जिला अदालतों में सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियाँ हैं।

  • अपर्याप्त पुलिस बल: कोर्ट के गेट्स पर मेटल डिटेक्टर, सीसीटीवी और पर्याप्त संख्या में सुरक्षा कर्मियों की कमी रहती है।
  • भीड़ का अनियंत्रित प्रवेश: वकीलों और वादियों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कोई सख्त प्रोटोकॉल नहीं होता है, जिससे तनावपूर्ण स्थितियों में भीड़ का फायदा उठाकर अराजकता फैलाई जाती है।

4. बार काउंसिल की भूमिका और ज़िम्मेदारी

बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) और राज्य बार काउंसिलों की यह मूल ज़िम्मेदारी है कि वे वकीलों के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करें।

  • कठोर दंड की आवश्यकता: ऐसी हिंसक और कानून-विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले वकीलों के खिलाफ कठोर और त्वरित दंड दिए जाने की आवश्यकता है, जिसमें उनका लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करना शामिल है।
  • नैतिकता का प्रशिक्षण: नए अधिवक्ताओं के लिए नैतिकता और पेशेवर आचरण पर अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।

📈 निष्कर्ष: न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता दाँव पर

कानपुर कचहरी की यह घटना केवल पुलिस और वकीलों के बीच की एक साधारण झड़प नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर एक सीधा हमला है। जब कानून के जानकार ही कानून को अपने हाथ में लेते हैं, तो आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वे न्याय के लिए किस पर भरोसा करें।

इस मामले में, आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव की कोर्ट कस्टडी एक सकारात्मक कदम है, लेकिन अब बार एसोसिएशन और पुलिस प्रशासन दोनों को मिलकर इस घटना के लिए ज़िम्मेदार व्यक्तियों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कोर्ट परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था और वकीलों के पेशेवर आचरण के नियमों को सख्ती से लागू करना समय की मांग है। अन्यथा, देश की न्यायपालिका की गरिमा को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।


❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न.

Q1. कानपुर कोर्ट में यह घटना क्यों हुई? (Focus Keyword: कानपुर कचहरी)

A1. यह घटना कानपुर कचहरी परिसर में जानलेवा हमले के मुख्य आरोपी और बहिष्कृत अधिवक्ता प्रिंस राज श्रीवास्तव की गिरफ्तारी के दौरान हुई। वकीलों के एक समूह ने पुलिस वैन को घेर लिया और आरोपी को छुड़ाने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस और वकीलों के बीच तीखी झड़प हुई और एक दरोगा पर हमला हुआ।

Q2. जानलेवा हमले का शिकार कौन हुआ है और उसकी हालत कैसी है?

A2. हमले का शिकार 22 वर्षीय एलएलबी छात्र अभिजीत सिंह हुआ है। हमले में उसकी दो अंगुलियां कट गईं, सिर पर गहरे घाव आए और आंतें बाहर आ गईं। उसकी हालत अत्यंत नाजुक है और वह फिलहाल सर्वोदय नगर के एक निजी अस्पताल के आईसीयू में जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है।

Q3. आरोपी प्रिंस राज श्रीवास्तव कौन है?

A3. प्रिंस राज श्रीवास्तव इस जानलेवा हमले का मुख्य आरोपी है। वह पेशे से एक बहिष्कृत अधिवक्ता है, जिसका अर्थ है कि वह अब बार एसोसिएशन का सक्रिय सदस्य नहीं है और उसे कोर्ट परिसर में वकालत करने की अनुमति नहीं है।

Q4. दरोगा पर हमला करने वाले पर क्या कार्रवाई की जाएगी?

A4. दरोगा पर हमला एक गंभीर अपराध है, जिसे सरकारी काम में बाधा डालने और ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक पर हमला करने के तहत देखा जाएगा। पुलिस को इस मामले में एक अलग एफआईआर दर्ज करनी होगी और वीडियो फुटेज के आधार पर हमलावर की पहचान कर उस पर कानूनी कार्रवाई करनी होगी।

Q5. इस घटना के बाद बार एसोसिएशन की क्या भूमिका है?

A5. बार एसोसिएशन की यह नैतिक और कानूनी ज़िम्मेदारी है कि वह अपने सदस्यों के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करे। उन्हें इस हिंसक घटना में शामिल वकीलों की पहचान कर उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, जिसमें लाइसेंस निलंबित या रद्द करना शामिल हो सकता है, ताकि न्यायपालिका की गरिमा बनी रहे।

External Source: upnownews.com

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